अनुदेशकों के संघर्ष की महाजीत: सुप्रीम कोर्ट ने माना—सम्मानजनक मानदेय संवैधानिक अधिकार है
उत्तर प्रदेश के सरकारी जूनियर स्कूलों में कार्यरत हजारों अनुदेशकों के लिए 4 फरवरी 2026 की तारीख इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से दर्ज हो गई है। वर्षों की कानूनी लड़ाई और अनगिनत संघर्षों के बाद, देश की सर्वोच्च अदालत ने अनुदेशकों के पक्ष में एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसने न केवल उनकी नौकरी सुरक्षित की है, बल्कि उनके आर्थिक शोषण पर भी पूर्णविराम लगा दिया है।नौकरी की सुरक्षा: अब ‘हटाने’ का डर खत्मकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि संविदा (Contract) की अवधि पूरी होने का मतलब यह कतई नहीं है कि सेवा स्वतः समाप्त हो जाए। 10 वर्षों की निरंतर सेवा के आधार पर अनुदेशकों को ‘डीम्ड परमानेंट/फुल टाइम’ माना गया है। कोर्ट ने साफ कहा कि इनके पद ‘ऑटोमेटिक सृजित’ माने जाएंगे।₹17,000 मानदेय: अधिकार, अहसान नहींसुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील को खारिज करते हुए ₹17,000 प्रतिमाह मानदेय के आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए 2013 से दिए जा रहे ₹7,000 के मानदेय को “अनुचित श्रम व्यवहार” करार दिया।”जब पढ़ेगा इंडिया, तभी बढ़ेगा इंडिया—तो फिर राष्ट्र निर्माण करने वाले इन शिक्षकों को उचित मानदेय देने में सरकार को क्या दिक्कत है?”— सुप्रीम कोर्टफैसले की मुख्य बातें और समय-सीमासंविधान का हवाला: ₹17,000 से कम मानदेय को अनुच्छेद 23 (शोषण के विरुद्ध अधिकार) का उल्लंघन माना गया।बकाया (Arrear) का भुगतान: वर्ष 2017-18 से अब तक का पूरा एरियर अनुदेशकों को मिलेगा।डेडलाइन: 4 फरवरी 2026 से 6 महीने के भीतर सारा बकाया भुगतान करना अनिवार्य होगा।नियमित भुगतान: 1 अप्रैल 2026 से सभी अनुदेशकों को ₹17,000 का नियमित भुगतान शुरू कर दिया जाएगा।निष्कर्ष: शिक्षा और सम्मान की जीतयह फैसला उन सभी संविदा कर्मियों के लिए एक मिसाल है जो न्यूनतम वेतन पर कठिन श्रम कर रहे हैं। कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि ‘अंशकालिक’ शब्द का उपयोग करके किसी का शोषण नहीं किया जा सकता। यह जीत अनुदेशकों के धैर्य, उनके संगठन की एकता और सत्य की जीत है।सभी अनुदेशक साथियों को इस ऐतिहासिक विजय पर बहुत-बहुत बधाई! 🌹🙏
